इस पारे में चार बातें हैं, (1) अकीदा (विश्वास), (2) खर्च करने की 5 शर्तें (3) आपसी लेन-देन के उसूल और (4) काफ़िरों से रिश्तों के नियम।

1.अकीदा विश्वास
रसूलों में तरजीह है, फर्क नहीं, इसके बाद आयतल कुर्सी है, जिसमें दस वाक्य हैं।
2. खर्च करने की 5 शर्तें
(1) ईमानदारी।
(2) माल जायज़ होना चाहिए।
(3) खर्च सही होना चाहिए।
(4) गरीबों पर मेहरबानी नहीं करनी चाहिए।
(5) गरीबों की बेइज्जती नहीं करनी चाहिए।
3.आपसी लेन-देन के उसूल
(1) हर बात को जितना हो सके लिख लेना चाहिए ताकि बाद में लड़ाई की नौबत न आए।
(2) लिखने वाले को लिखने में ज़्यादा या कमी नहीं करनी चाहिए।
(3) कर्जदार पर भी यह ज़रूरी है कि वह उतनी ही रकम लिखवाए जितनी ज़रूरी हो, या उससे कम।
(4) अगर कर्जदार खुद नहीं लिख सकता, तो किसी भरोसेमंद और विश्वसनीय अभिभावक को यह दस्तावेज़ लिखना चाहिए।
(5) इस दस्तावेज़ के साथ समझौते को सही ठहराने के लिए दो पुरुष गवाह कैसे बनाए जा सकते हैं? अगर दो पुरुष नहीं हैं, तो एक पुरुष और दो महिलाओं को गवाह बनाया जाना चाहिए।
(6) अगर मामला सुलझाना मुमकिन न हो, तो कुछ वादा कर लेना चाहिए।
4.काफ़िरों से रिश्तों के नियम
(1) मवालत: यानी काफ़िरों से अच्छी दोस्ती रखना हर हाल में मना है।
(2) मवासत: यानी अच्छाई करना और फ़ायदा पहुँचाना, उन काफ़िरों के साथ जाइज़ है जो किसी इस्लामी देश में शांति चाहते हैं और मुसलमानों के देश के क़ानून मानते हैं, और उन लोगों के साथ हराम है जो जंगी काफ़िर हैं, यानी जो मुसलमानों के ख़िलाफ़ लड़ रहे हैं।
(3) मदारत: यानी साफ़ तौर पर अच्छे व्यवहार करना, तभी जाइज़ है जब उनसे किसी नुकसान का पक्का यकीन हो या जब उनसे किसी धार्मिक फ़ायदे की उम्मीद हो, वरना निजी फ़ायदे के लिए ऐसा करना जाइज़ है।
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आपकी समझ को गहरा करने के लिए सुझाई गई पुस्तकें
यहाँ कुछ प्रामाणिक और प्रेरक पुस्तकें दी गई हैं जिन्हें आप मुफ़्त में पढ़ सकते हैं (पीडीएफ़ प्रारूप में):
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